Tuesday, 12 November 2013

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---║ॐ नमः शिवाय ║---

#शिवलिंग के बारे में भ्रांतियां

शिवलिंग के बारे में लोगों को इतनी ज्यादा भ्रांतियां हैं और वो भी उसके नाम को लेकर !! लोग आज कल जो उसका मतलब निकालते हैं वो यहाँ मैं नहीं कह सकता क्योंकि उस भ्रान्ति का प्रचार हम नहीं करना चाहते।
सबसे पहली बात संस्कृत में "लिंग" का अर्थ होता है प्रतीक।
Penis या जननेंद्रि के लिए संस्कृत में एक दूसरा शब्द है - "शिश्न".

शिवलिंग भगवान् के निर्गुण-निराकार रूप का प्रतीक है। भगवान् का वह रूप जिसका कोई आकार नहीं जिसमे कोई गुण ( सात्विक,राजसिक और तामसिक ) नहीं है , जो पूरे ब्रह्माण्ड का प्रतीक है और जो शून्य-अवस्था का प्रतीक है। ध्यान में योगी जिस शांत शून्य भाव को प्राप्त करते हैं, जो इश्वर के शांत और परम-आनंद स्वरुप का प्रतीक है उसे ही शिवलिंग कहते हैं।

शिवलिंग में दूध अथवा जल की धारा चढ़ाने से अपने आप मन शांत हो जाता है ये हम सबका अनुभव है, और इसके पीछे मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। जो सच्चे ब्राह्मण हैं वो इस बात को जानते हैं कि शिवलिंग पर जल या दूध चढाते समय "ॐ नमः शिवाय " बोलने की अपेक्षा केवल "ॐ ॐ " बोलना उत्तम है.#शिव अभिषेक करते समय उसमे #भगवान् शंकर के सगुण-साकार रूप का ध्यान भी किया जा सकता है, किया जाता भी है. भक्त की भावना के अनुसार सबको छूट है इसी कारण आपने देखा होगा कि बाकी मंदिरों में मूर्ति का स्पर्श वर्जित होता है पर शिवलिंग का हर कोई स्पर्श कर सकता है (स्त्रियाँ पूरे महीने स्पर्श नहीं कर सकतीं).

शिवलिंग को भगवान् शंकर का निर्गुण प्रतीक माना जाता है और भगवान् के सगुण रूप का वास कैलाश पर्वत पर माना गया है. ( कुछ लोग बेहेस करते हैं कि भगवान् केवल कैलाश में ही है क्या ?? आदि आदि ; तो भाई सुनो - जैसे भगवान् ने गीता में कहा है कि " पौधों में मै तुलसी हूँ ", " गायों में मै कामधेनु हूँ ", "तीर्थों में मै प्रयाग हूँ " आदि आदि. इसका मतलब ये है कि जो सबसे पवित्र चीज़ हो उसमे #इश्वर का वास मानना चाहिए फिर धीरे धीरे आप सब जगह भगवान् को देख पाएंगे। पहले आप मित्र में इश्वर को देखोगे तभी बाद में शत्रु में देख सकोगे ) तो कैलाश में भगवान् को जल मिल जाए , हमारा चढ़ाया हुआ दूध उनको वहां मिल जाए , उसके लिए शिवलिंग के चारों तरफ "जल - घेरी " बनाई जाती है। जल-घेरी की दिशा हमेशा उत्तर दिशा की तरफ होनी चाहिए जिससे हमारा चढ़ाया हुआ दूध या जल सीधा उन तक पहुँच जाए।

और इसी कारण जल-घेरी को कभी लांघते नहीं हैं और शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही करते हैं। सावन में जल लगातार भगवान् को चढ़ता रहे इसी कारण शिवलिंग के ऊपर जल से भरा हुआ कलश लटकाया जाता है.
जलघेरी पर कभी दिया नहीं जलाते और शिवलिंग या तुलसी या किसी भी मूर्ती को दिए की आंच नहीं लगनी चाहिये. दिया थोडा सा दूर जलाना होता है। शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ नारियल कभी फोड़ा नहीं जाता उसे विसर्जित कर दिया जाता है।

शिवलिंग भगवान् शंकर का प्रतीक होने के कारण उसे तुलसी के नीचे नहीं रखा जाता , तुलसी के नीचे शालिग्राम ( भगवान् विष्णु का निर्गुण रूप ) रखा जाता है. हालांकि शिवलिंग में मंजरी (तुलसी के फूल) चढ़ाए जाते हैं।""शिवलिंग : शिवलिंग के बारे में लोगों को इतनी ज्यादा भ्रांतियां हैं और वो भी उसके नाम को लेकर !! लोग आज कल जो उसका मतलब निकालते हैं वो यहाँ मैं नहीं कह सकता क्योंकि उस भ्रान्ति का प्रचार हम नहीं करना चाहते।
सबसे पहली बात संस्कृत में "लिंग" का अर्थ होता है प्रतीक।
Penis या जननेंद्रि के लिए संस्कृत में एक दूसरा शब्द है - "शिश्न".

शिवलिंग भगवान् के निर्गुण-निराकार रूप का प्रतीक है। भगवान् का वह रूप जिसका कोई आकार नहीं जिसमे कोई गुण ( सात्विक,राजसिक और तामसिक ) नहीं है , जो पूरे ब्रह्माण्ड का प्रतीक है और जो शून्य-अवस्था का प्रतीक है। ध्यान में योगी जिस शांत शून्य भाव को प्राप्त करते हैं, जो इश्वर के शांत और परम-आनंद स्वरुप का प्रतीक है उसे ही शिवलिंग कहते हैं।

शिवलिंग में दूध अथवा जल की धारा चढ़ाने से अपने आप मन शांत हो जाता है ये हम सबका अनुभव है, और इसके पीछे मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। शिवलिंग पर जल या दूध चढाते समय "ॐ नमः शिवाय " बोलने की अपेक्षा केवल "ॐ ॐ " बोलना उत्तम है. शिव अभिषेक करते समय उसमे भगवान् शंकर के सगुण-साकार रूप का ध्यान भी किया जा सकता है, किया जाता भी है. भक्त की भावना के अनुसार सबको छूट है इसी कारण आपने देखा होगा कि बाकी मंदिरों में मूर्ति का स्पर्श वर्जित होता है पर शिवलिंग का हर कोई स्पर्श कर सकता है (स्त्रियाँ पूरे महीने स्पर्श नहीं कर सकतीं).

शिवलिंग को भगवान् शंकर का निर्गुण प्रतीक माना जाता है और भगवान् के सगुण रूप का वास कैलाश पर्वत पर माना गया है .!!
:::सनातन धर्म:::

___इस प्रकार रहस्यों की व्याख्या के प्रसार का उदय हुआ उस वैज्ञानिक परिक्रिया को आदि धर्म या सनातन धर्मकी संज्ञा दी गयी। कालान्तर वही हिन्दू धर्मके नाम से अधिक प्रसिद्ध हो गया। दूसरे धर्म सनातन धर्म के बाद में आये। सभी आदि धर्मों का मूल स्त्रोत्र भारत से ही था। हिन्दू धर्म के साथ बहुत कुछ समान विचार-धाराऐं थीं। कालान्तर अज्ञानवश और स्वार्थ – वश योरूप वासियों ने स्थानीय आदि धर्मों को पैगनज़िम कहना शुरु कर दिया और मुसलमानों ने कुफ़र या जहालत कहा। वह यह नहीं समझ पाये कि धर्म सम्वन्धी उन के अपने कथन कितने तर्कहीन थे जब कि सनातन धर्म का वैज्ञानिक आधार परम्परागत निजि अनुभूतियों पर टिका हुया था। स्नातन धर्म दूआरा व्याख्यिततथ्यों के प्रत्यक्षप्रमाण दैनिक जीवन में स्वयं देखे जा सकते थे।

यह कितने आश्चर्य की बात है कि इसाई, मुसलिम तथा कुछ तथा-कथित हिन्दू दलित नेता वनवासियों को दूसरे धर्मों में परिवर्तित करने के लिये दुष्प्रचार करते हैं कि वनवासी अपने आप को हिन्दू ना कहें और हिन्दू धर्म से विमुख हो जायें। ऐसा हिन्दू धर्म की ऐकता नष्ट करने के लिये किया जाता है ताकि भारत पर इसाई या मुसलिम शासन कायम किया जा सके और दलित नेताओं को नेतागिरी मिली रहे। यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि भारत में आज कोई हिन्दू मत का प्रचार करे तो वह प्रगतिवादी बन जाता है और यदि किसी हिन्दू को भारत में हिन्दू ही बने रहने के लिये उत्साहित करे तो उसे कट्टर पंथी कहा जाता है।

मुख्यता सनातन धर्म का सारांश प्रकृतिक जीवन जीना है जिस में सभी पशु पक्षी और मानव मिल-जुल कर आपसी भाई-चारे से रहें और समस्त विश्व को ऐक बडा़ परिवार जाने। आदि मानव व्दरा विकसित सनातन धर्मवसुदैव कुटुम्बकुम का प्रेरणा स्त्रोत्र है जिस के जन्मदाता ऋषि-मुनी स्वयं वनवासी थे।"
एक बार मुझसे एक मित्र ने सवाल पुच लिया की bhai शिव जी पे दूध चढ़ाने की बजाये गरीबो में बांटो ..वो अच्छा है..

तो मेने पूछा की bhai जब में या कोई और हिन्दू 10 या ज्यादा से ज्यादा 20 रूपये का दूध शिव जी को चढाते है तो तुम लोग भोखने लगते है..

लेकिन तेरी ये सोच तब कहा चल जाती है जब तू 500 रूपये खर्च करके फिल्म देखने जाता है..जब तू ऑफिस अपनी कार से जाता है जबकि तू साइकिल या बस से भी जा सकता है..
जब तू हजारो रूपये खर्च करके होटल में खाना जाता है जबकि तेरा काम ढाबे से भी चल सकता है..

जब तुम हजारो रूपये बर्बाद कर दो तो तुम्हे गरीबो की याद नहीं आती..लेकिन जब में केवल और केवल 10 रूपये मेरी मर्जी से खर्च करू तो तुम ज्ञान देने आ जाते हो..

बस इतना सुनते ही मेरे दोस्त का मुह लटक गया उसे अपनी गलती का अहसास हो गया...

------------║ॐ नमः शिवाय ║----------
------------║. हर हर महादेव.║-----------
मौलाना अबुल कलाम आजाद हिन्‍दू-मुस्लिम एकता के नाम पर हमेशा कट्टरपंथी मुसलमानों से ही मेल मिलाते रहे, और उनके साथ मिलकर पूरे भारत को इस्‍लामीकरण का सपना देखते रहते थे।

सही मायने में देखा जाये तो आजाद पूरे भारत को मुगलिस्‍तान के रूप में देखना चाहते थे। वे भारत के इस्लामीकरण की वकालत करते हुए कहा था कि ’भारत जैसे देश को जो एक बार मुसलमानों के शासन में रहा चुका है, कभी भी त्यागा नहीं जा सकता और प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है कि उस खोई हुई मुस्लिम सत्ता को फिर प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करे’ (बी.आर.नन्दा, गांधी पैन इस्लामिज्म, इम्पीरियालज्म एण्ड नेशनलिज्म, पृ. ११७)

और तो और इनके द्वारा मुस्लिम कट्टरता को देखकर लौह पुरूष सरदार पटेल ने इन्‍हें कभी राष्‍ट्रवादी नही माना था। क्‍योंकि ये घोर इस्‍लाम परस्‍त थे। जबकि कांग्रेस अबुल कलाम आजाद को हिन्‍दु बहुल क्षेत्र से चुनकर सांसद बनवाती थी।

इनका यदि व्‍यापक प्रभाव देखा जाये तो नगण्‍य था। इनके प्रभाव से 1945-46 के चुनाव में केवल 5 से 6 प्रतिशत मुसलमानों ने कांग्रेस को वोट दिया।

जिन्‍ना का आबादी का अदला-बदली प्रस्‍ताव को इन्‍होंने ही गांधी व नेहरू के द्वारा ठुकरवा दिया था। जिससे भारत को फिर इस्‍लामिक चंगुल में फंसाया जा सके।

चुनाव के समय 63 लाख मुस्लिमों ने केवल कांग्रेस को वोट दिया। इनके हिस्‍से की जमीन केवल 23000 वर्गमील बनती थी। जब इन्‍हें भारत में ही रहना था तो मौलाना आजाद को सीमा निर्धारण आयोग से कहना चाहिये था कि 7 प्रतिशत मुस्लिमों के हिस्‍सों की 23000 वर्गमील जमीन पाकिस्‍तान को न दी जाये।

मगर आजाद ने ऐसा कुछ नही किया। यदि ये ढंग से अपने कर्तवय का निर्वहन करते तो लाहौर, स्‍यालकोट, थारपारकर और उमरकोट जिले भारत में ही रहते। अंदर ही अंदर इस्‍लामपरस्‍ती होने के कारण चाहते थे कि कितनी से कितनी ज्‍यादा जमीन पाकिस्‍तान को दे दिया जाये और ज्‍यादा से ज्‍यादा मुसलमान इस देश में रह जायें। आगे फिर इस्‍लाममिक जेहाद के द्वारा भारत को फिर एक इस्‍लामिक राष्‍ट्र बनाया जा सके।

उनके प्रयास से खंडित भारत की नीतियां मुस्लिम समर्थक बनीं। इनके प्रयासों से ही नेहरू ने मुस्लिम तुष्‍टीकरण को बढ़ावा दिया। लोकसभा ने सर्वसम्‍मति से प्रस्‍ताव पारित कर हैदराबाद में मौलाना आजाद नेशनल विश्‍वविद्यालय बनवा दी। इनका जन्‍म दिन राष्‍ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।



इसके साथ इस्लामी शासन कालों में समस्त 16 संस्कारों पर TAX लगाया जाता था, प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के दबाव से अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहासकारों ने भारतीय शिक्षा पद्धति की इतिहास की पुस्तकों में जगह नहीं दी l

कलाम आजाद ने की थी बहुत बड़ी ऐतिहासिक भूल जिसकी सजा आज की पीढि़यां भुगत रही हैं



कांग्रेस के अध्यक्ष रहे मौलाना अबुल कलाम आजाद ने माना था कि पटेल पर नेहरू को चुनने का गांधी का फैसला गलत था। उन्होंने अपनी आत्मकथा में इस बारे में लिखा था। अबुल कलाम के निधन के बाद 1959 में प्रकाशित उनकी आत्मकथा में उन्होंने लिखा, ‘यह मेरी गलती थी कि मैंने सरदार पटेल का समर्थन नहीं किया। हम कई मुद्दों पर अलग राय रखते थे। लेकिन मुझे लगता है कि अगर मेरे बाद पटेल कांग्रेस के अध्यक्ष बनते तो शायद कैबिनेट मिशन प्लान कामयाबी से लागू किया जाता। वे नेहरू की तरह जिन्ना को पूरे प्लान को बर्बाद करने का मौका देने जैसी गलती नहीं करते। मैं अपने को कभी माफ नहीं कर सकता। जब मैं सोचता हूं मैंने ये गलतियां नहीं की होतीं तो शायद बीते दस साल का इतिहास कुछ और होता।’